
●(दिव्यराष्ट्र के लिए डॉ. विजय विप्लवी, एडवोकेट)●
भारतीय संविधान केवल विधिक दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत की सहस्राब्दियों पुरानी सांस्कृतिक, दार्शनिक और ऐतिहासिक चेतना का समग्र घोष है। इसकी मूल प्रति में अंकित चित्र इस तथ्य को रेखांकित करते हैं कि संविधान निर्माता भारत की शासन-व्यवस्था को उसकी सभ्यतागत जड़ों से काटकर नहीं, बल्कि उन्हीं मूल्यों की निरंतरता में विकसित करना चाहते थे। संविधान के प्रत्येक अध्याय से पूर्व बनाए गए चित्र न केवल कलात्मक सौंदर्य का उदाहरण हैं, बल्कि वे संबंधित संवैधानिक विषयवस्तु के सांस्कृतिक और वैचारिक स्रोतों को भी रेखांकित करते हैं। प्रस्तुत चित्र-सूची के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि संविधान का प्रत्येक भाग भारतीय जीवन-दर्शन से अनुप्राणित है।
भाग 1 : ‘हमारा भारत’ – राष्ट्रीय एकता का प्रतीक
प्रथम चित्र ‘मोहनजोदड़ो का प्रतीक चित्र’ है, जो ‘हमारा भारत’ की अवधारणा को पुष्ट करता है। यह चित्र भारत की प्राचीन नगर सभ्यता, संगठित सामाजिक जीवन और सामूहिक चेतना का स्मरण कराता है। संवैधानिक दृष्टि से यह भाग राष्ट्र की अखंडता, संप्रभुता और एकता के मूल विचार को रेखांकित करता है।
भाग 2 : वैदिक गुरुकुल और नागरिकता
वैदिक काल के गुरुकुल का चित्र नागरिकता के मूल भाव को दर्शाता है। शिक्षा, अनुशासन और कर्तव्यबोध भारतीय नागरिकता के प्राचीन आधार रहे हैं। संविधान में नागरिकता केवल अधिकार नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व की अवधारणा से जुड़ी है।
भाग 3 : राम–लक्ष्मण–सीता का अयोध्या गमन और मौलिक अधिकार
पुष्पक विमान से अयोध्या गमन का दृश्य न्याय, धर्म और मर्यादा के प्रतीक श्रीराम के आदर्शों से जुड़ा है। यह चित्र मौलिक अधिकारों के साथ-साथ मर्यादित आचरण और कर्तव्य की भावना का सांस्कृतिक आधार प्रस्तुत करता है।
भाग 4 : श्रीकृष्ण–अर्जुन संवाद और नीति-निर्देशक तत्व
गीता उपदेश का चित्र नीति-निर्देशक तत्वों का दार्शनिक आधार है। यह कर्म, कर्तव्य और लोककल्याण की भावना को रेखांकित करता है, जो संविधान की सामाजिक–आर्थिक नीति का मूल है।
भाग 5 : बुद्ध का देशाटन और कार्यपालिका
गौतम बुद्ध के देशाटन का चित्र प्रशासनिक सक्रियता, लोकसंपर्क और करुणा आधारित शासन का संकेत देता है। कार्यपालिका का उद्देश्य केवल शासन नहीं, बल्कि लोककल्याण है—यह भाव इस चित्र में निहित है।
भाग 6 : महावीर और न्यायपालिका
भगवान महावीर का चित्र न्याय, अहिंसा और सत्य का प्रतीक है। न्यायपालिका की निष्पक्षता और नैतिक आधार को यह चित्र सांस्कृतिक समर्थन देता है।
भाग 7 : मौर्यकाल और राज्य संरचना
मौर्यकालीन समृद्धि का चित्र संघात्मक ढांचे में राज्यों की भूमिका और संतुलन को दर्शाता है। यह केंद्र–राज्य संबंधों की ऐतिहासिक निरंतरता को रेखांकित करता है।
भाग 8 : कुबेर की छलांग और प्रशासन
समृद्धि के प्रतीक कुबेर प्रशासनिक दक्षता और संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग का संकेत हैं, जो अध्यादेश एवं शासन प्रणाली से जुड़ता है।
भाग 9 : विक्रमादित्य का दरबार और स्थानीय स्वशासन
न्यायप्रिय सम्राट विक्रमादित्य का चित्र पंचायत और नगरपालिका जैसी संस्थाओं की ऐतिहासिक जड़ों को दर्शाता है।
भाग 10 : नालंदा विश्वविद्यालय और अनुसूचित जनजाति
नालंदा ज्ञान, समावेशन और बौद्धिक समानता का प्रतीक है। यह चित्र वंचित वर्गों के शैक्षिक और सामाजिक उत्थान की संवैधानिक भावना से जुड़ता है।
भाग 11 : अश्वमेध यज्ञ और केंद्र–राज्य संबंध
अश्वमेध यज्ञ संप्रभुता और समन्वय का प्रतीक है, जो संघीय ढांचे में केंद्र–राज्य संबंधों की अवधारणा को दर्शाता है।
भाग 12 : नटराज, स्वस्तिक और वित्त
नटराज का नृत्य और स्वस्तिक संतुलन, गति और समृद्धि के प्रतीक हैं, जो वित्त और संपत्ति के नियमन से जुड़ते हैं।
भाग 13 : भगीरथ प्रयास और व्यापार नीति
गंगा अवतरण का चित्र सतत प्रयास और लोककल्याण का प्रतीक है, जो व्यापार–वाणिज्य नीति के नैतिक आधार को दर्शाता है।
भाग 14 : अकबर का दरबार और सेवाएँ
अकबर का दरबार प्रशासनिक समन्वय और लोकसेवा की परंपरा को रेखांकित करता है।
भाग 15 : शिवाजी और गुरु गोविंद सिंह – निर्वाचन
यह चित्र साहस, लोकसमर्थन और नेतृत्व की अवधारणा को लोकतांत्रिक चुनाव प्रणाली से जोड़ता है।
भाग 16 : रानी लक्ष्मीबाई और टीपू सुल्तान – आरक्षण
संघर्ष और समान अवसर का यह प्रतीक सामाजिक न्याय और आरक्षण की संवैधानिक भावना को पुष्ट करता है।
भाग 17 : लाठीधारी गांधी और राजभाषा
महात्मा गांधी का चित्र भाषा को जनसंपर्क और एकता का माध्यम मानता है।
भाग 18 : गांधी की शांति यात्रा और आपात प्रबंधन
यह चित्र संकट में नैतिक नेतृत्व और सामाजिक संतुलन का संदेश देता है।
भाग 19 : नेताजी और आज़ाद हिंद फ़ौज – संस्थाएँ
संगठन, अनुशासन और राष्ट्रीय समर्पण का यह दृश्य संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका को रेखांकित करता है।
भाग 20–22 : आकाश, धरती और जल
हिमालय, मरुस्थल और समुद्र के चित्र संविधान संशोधन, सीमा-सुरक्षा और भाषा–अनुवाद जैसे विषयों को व्यापक भौगोलिक–सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करते हैं।
भाग 21- मरुस्थल तथा ऊंटों की सवारी
यह चित्र भारत की भौगोलिक विविधता को दर्शाता है। भारत के चारों छोरों पर कही हिमगिरि, कहीं सागर तो कही मरुस्थल है।
संविधान की मूल प्रति के ये चित्र भारतीय राज्य की आत्मा को दृश्य रूप प्रदान करते हैं। वे यह स्पष्ट करते हैं कि भारतीय संविधान पश्चिमी अवधारणाओं की नकल नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के अनुभवों का आधुनिक विधान है। यही कारण है कि यह संविधान केवल शासन-पुस्तक नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मकथा भी है। हमारे संविधान निर्माताओं ने विचार किया कि भारत की संस्कृति, संस्कार और सभ्यतामूलक इतिहास को भी विभिन्न छवियों के द्वारा संविधान में स्थान मिलना चाहिये। तद्नुसार उन चित्रों से मूल संविधान की प्रति को जीवंत रुप प्रदान किया गया, लेकिन उस मूलप्रति को आमजन की नजर से दूर संसद् भवन के तहखाने में सुरक्षित रखवा दिया गया। उसके बाद देशभर में और यहां तक विधि महाविद्यालय और विश्वविद्यालयों में भी बिना चित्रों का भारतीय संविधान पढाया गया जिसमें 395 अनुच्छेद, 22 भाग व बारह अनुसूचियां शामिल है, लेकिन हमारी समृद्ध सांस्कृतिक व धार्मिक विरासत को दर्शाने वाले प्रतीक चित्रों से आमजन तो क्या जनप्रतिनिधि व विधि के ज्ञाता तक भी अनभिज्ञ रह गये। वरिष्ठ नेता व पूर्व केन्द्रीय मंत्री राम नाईक की पहल पर संविधान की मूल प्रति जनदर्शन के लिये रखवाने व उसकी प्रतियां छपवाकर बिक्री के लिये उपलब्ध कराने का कार्य प्रारम्भ हुआ।




