
(डॉ. सीमा दाधीच)
सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव गाँव में हुआ था। भारत की पहली महिला जिसके विचार और दूरदर्शिता से आधुनिक युग की नींव रखा जो उस समय स्त्री कल्पना के परे था, सावित्री बाई महान समाज सुधारक, शिक्षिका और कवयित्री, जिन्हें ‘भारत की पहली महिला शिक्षिका’ के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर 5 सितंबर 1848 में पुणे में विभिन्न जातियों की नौ छात्राओं के साथ उन्होंने एक विद्यालय की स्थापना की। इसका उन दिनों बहुत विरोध हुआ फिर भी एक वर्ष में सावित्रीबाई और महात्मा फुले पाँच नये विद्यालय खोलने में सफल हुए। एक महिला प्रिंसिपल के लिये सन् 1848 में बालिका विद्यालय चलाना कितना मुश्किल रहा होगा, इसकी कल्पना शायद आज भी नहीं की जा सकती। उनकी सोच में किसी भी तरह भेदभाव नहीं था उन्होंने हर वर्ग के लोगों को आगे बढ़ाने का प्रयास किया, खासकर महिलाओं और दलितों की शिक्षा के लिए विद्यालय,सत्यशोधक समाज (1873) की स्थापना की, सामाजिक असमानता और बाल विवाह जैसी कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई, और महिला सशक्तिकरण तथा शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति लाते हुए भारतीय नारी आंदोलन की नींव रखी।
सावित्री बाई फुले ने
महिला सशक्तिकरण, महिला सेवा मंडल की स्थापना की, विधवा पुनर्विवाह की वकालत की,और विधवाओं के मुंडन प्रथा के खिलाफ नाइयों की हड़ताल करवाई। यह कार्य कोई सरल नहीं था उस समय शिक्षा में क्रांति का नया दौर आया लड़कियों की शिक्षा सामाजिक पाबंदी थी फिर भी सावित्रीबाई फुले न सिर्फ खुद पढ़ीं, बल्कि दूसरी लड़कियों के पढ़ने का भी बंदोबस्त किया
सावित्रीबाई फुले ने रात की शिक्षा (रात्री शिक्षा) पर विशेष जोर दिया, खास कर समाज की वंचित, बहिष्कृत वर्गों की महिलाओं के लिए, ताकि वे दिन के काम के बाद भी पढ़-लिख सकें उन्होंने अपने पति ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला,शिक्षा को सशक्तिकरण का माध्यम मानती थीं और इसके लिए उन्हें पत्थर-गोबर का सामना करना पड़ा, लेकिन वह पथ से डिगी नहीं, जिससे वे भारत की पहली महिला शिक्षिका और नारी आंदोलन की जननी कहलाईं। उन्होंने विधवाओं और बेसहारा महिलाओं के लिए ‘बाल हत्या प्रतिबंधक गृह’ खोला, जहाँ वे न केवल उन्हें आश्रय देती थीं, बल्कि खुद भी उन्हें पढ़ाती थीं। सावित्री बाई की शादी मात्र 9 वर्ष की उम्र में हुआ उस समय ज्योतिराव की उम्र मात्र 13 वर्ष थी पर ये दोनों समाज के पथ प्रदर्शक बने,उन्होंने सदैव शिक्षा और साक्षरता के क्षेत्र में महिलाओं और अछूतों उत्थान के लिये काम किया।उनका उद्देश्य समाज में विधवा विवाह करवाना, छुआछूत मिटाना, महिलाओं की मुक्ति और दलित महिलाओं को शिक्षित बनाना था।
सावित्रीबाई फुले को आधुनिक भारत में एक ऐसी महिला के रूप में भी श्रेय दिया जाता है जिन्होंने ऐसे समय में जब महिलाओं को दबाया जा रहा था और वे उप-मानव के अस्तित्व में जी रही थीं फुले ने स्वयं की आवाज़ को बुलंद किया और महिला अधिकारों के लिये संघर्ष किया।उनकी कविताएँ भले ही मराठी में लिखी गई थीं किंतु उन्होंने मानवतावाद, स्वतंत्रता, समानता, भाईचारा, तर्कवाद और दूसरों के बीच शिक्षा के महत्त्व जैसे मूल्यों की पूरे देश में वकालत की।
उनके द्वारा स्थापित संस्था ‘सत्यशोधन समाज’ ने वर्ष 1876 और वर्ष 1879 के अकाल में अन्न सत्र चलाया और अन्न इकटठा करके आश्रम में रहने वाले 2000 बच्चों को खाना खिलाने की व्यवस्था की यह कोई अन्नदात्री से कम नहीं थी,महिलाओं को सशक्त बनाने व सामाजिक, आर्थिक दशा सुधारने में तीन तलाक, तत्काल तलाक को एक आपराधिक कानून बनाना और लड़कियों की शादी की उम्र को बढ़ाकर 21 वर्ष करना एक मील का पत्थर है। ये प्रगतिशील कदम सावित्रीबाई फुले के विचारों व अभियान के अनुरूप हैं।
सावित्रीबाई फुले द्वारा महिला सशक्तिकरण के लिए दिखाए गए मार्ग का अनुसरण सभी को करना चाहिए।आज भले ही लड़कियों के प्रति हमारी सोच बदल गई है लेकिन इसका श्रेय सावित्री बाई की पहल को जाता है। सावित्रीबाई फुले की कल्पना के अनुसार महिलाओं के सर्वांगीण विकास के लिए कड़ी मेहनत करें और आरक्षण में महिला की बराबर समानता का अनुपात ही विकास की खाई को पात सकता है।





