अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चुनाव से पहले मतदाताओं से कहा था – “मानो मैं ही बैलट पर हूँ।” जनता ने बात मान ली, और 3 नवंबर को हुए मध्यावधि चुनाव में उन्हें ऐसा जवाब दिया, जिसे ट्रंप युग की सबसे बड़ी अस्वीकृति कहा जा रहा है।
डेमोक्रेटिक पार्टी ने सीनेट और हाउस, दोनों पर कब्जा कर लिया है। सीनेट में डेमोक्रेट्स 54 सीटों पर पहुंच गए, रिपब्लिकन 44 पर सिमट गए। हाउस में भी डेमोक्रेट्स को 228 सीटें मिल चुकी हैं और 34 पर बढ़त है। टेक्सास, कंसास, साउथ कैरोलिना, आयोवा, ओहायो – जो कभी रिपब्लिकन के अभेद्य किले थे, वहां भी नीली लहर चली।
हार की तीन वजहें साफ हैं – महंगाई, ईरान युद्ध और ट्रंप की कार्यशैली। सितंबर में महंगाई 3.7% तक पहुंची, 79% मतदाताओं ने कहा महंगाई ने परिवार को संकट में डाल दिया। 63% ने ईरान युद्ध को गलत बताया। जिन मतदाताओं ने ट्रंप को ध्यान में रखकर वोट दिया, उनमें विरोध करने वाले समर्थकों से करीब दोगुने थे।
अब सवाल भारत का है – इस हार से दिल्ली के लिए क्या बदलेगा?
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत पर भारी टैरिफ लगाए गए। खासकर रूसी तेल खरीदने पर पेनल्टी टैरिफ ने भारत-अमेरिका व्यापार को तनाव में डाल दिया। अब हाउस में डेमोक्रेटिक बहुमत के बाद ट्रंप मनमाने टैरिफ नहीं लगा पाएंगे। कांग्रेस टैरिफ नीति की जांच कर सकती है, राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियों पर लगाम लगा सकती है। भारतीय निर्यातकों के लिए यह राहत की खबर हो सकती है।
ईरान युद्ध के कारण तेल और डीजल की कीमतें बढ़ीं, जिसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ा। अमेरिकी जनता ने युद्ध को नकार दिया है। अब ट्रंप प्रशासन पर युद्ध खत्म करने और कूटनीति पर लौटने का दबाव बढ़ेगा। भारत, जो ईरान और अमेरिका दोनों से संबंध रखता है, उसके लिए यह कूटनीतिक जगह बढ़ाएगा।
ट्रंप शासन में वीजा नियम सख्त हुए, भारतीय छात्रों और आईटी पेशेवरों को परेशानी हुई। डेमोक्रेट्स आमतौर पर आव्रजन पर नरम रुख रखते हैं। हाउस में उनकी जीत से वीजा नीति में स्थिरता की उम्मीद बढ़ी है। ओहायो में विवेक रामास्वामी की हार भी दिखाती है कि भारतीय-अमेरिकी राजनीति में सिर्फ ट्रंप का समर्थन जीत की गारंटी नहीं रहा।
लेकिन दिल्ली को भ्रम में नहीं रहना चाहिए। डेमोक्रेट्स भारत के दोस्त हैं, यह मान लेना जल्दबाजी होगी। डेमोक्रेटिक कांग्रेस मानवाधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, रूस से तेल खरीद और व्यापार घाटे पर भारत से और ज्यादा सवाल पूछ सकती है। ट्रंप भले ही कमजोर हुए हों, लेकिन अमेरिकी विदेश नीति में भारत को चीन के मुकाबले देखने का नजरिया दोनों दलों में एक जैसा है।
भारत के लिए असली रणनीति यही होनी चाहिए – ट्रंप की कमजोरी का फायदा उठाकर जल्दबाजी में कोई सौदा न करें, बल्कि नई कांग्रेस के साथ सीधे संवाद बढ़ाएं। टैरिफ, रक्षा सौदे, क्वाड और टेक्नोलॉजी सहयोग पर द्विदलीय समर्थन बनाना होगा।
ट्रंप की हार भारत के लिए न तो पूरी जीत है, न पूरी हार। यह एक मौका है – मनमानी टैरिफ और युद्ध की राजनीति से राहत का, और अमेरिका में नए संतुलन के साथ रिश्तों को फिर से परिभाषित करने का। दिल्ली को इस मौके को समझदारी से भुनाना होगा, क्योंकि वाशिंगटन में सत्ता भले ही बंट गई हो, लेकिन अमेरिकी हित वहीं रहेंगे।