
जयपुर, फरवरी 2026.
राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) के अध्यक्ष ने पत्रकारों के साथ एक विस्तृत बातचीत में भारत के डेयरी क्षेत्र की अभूतपूर्व प्रगति और आने वाले समय के लिए निर्धारित रणनीतिक लक्ष्यों का विवरण साझा किया। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष भारत का दूध उत्पादन 248 मिलियन मीट्रिक टन तक पहुँच गया है, जो वैश्विक स्तर पर एक बड़ी उपलब्धि है। पिछले दशक में भारत ने 5% से 6% की चक्रवृद्धि वार्षिक विकास दर (CAGR) दर्ज की है, जबकि इसी अवधि में वैश्विक विकास दर मात्र 2% रही है। आज दुनिया के कुल दूध उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी लगभग 24% से 25% है, जिसका अर्थ है कि दुनिया का हर चौथा गिलास दूध भारत में पैदा हो रहा है। इस क्षेत्र की सफलता का श्रेय 1970 में शुरू हुए एनडीडीबी के कार्यों और सहकारी मॉडलों जैसे अमूल, सरस और नंदिनी को दिया गया है, जिन्होंने भारत को दूध की कमी वाले देश से दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक बना दिया है।
अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि यद्यपि भारत सबसे बड़ा उत्पादक है, फिर भी हम ‘सरप्लस’ की स्थिति में नहीं हैं क्योंकि हमारी घरेलू खपत भी उतनी ही अधिक है। इस संतुलन के कारण भारतीय किसानों को कभी भुगतान के संकट का सामना नहीं करना पड़ता। वर्तमान में, डेयरी सहकारी समितियाँ प्रतिदिन 6.5 करोड़ लीटर दूध एकत्र कर रही हैं। एनडीडीबी अब ‘श्वेत क्रांति 2’ योजना के माध्यम से अपनी पहुँच का विस्तार करने जा रहा है, जिसका लक्ष्य अगले पांच वर्षों में देश के शेष 70% गांवों तक पहुँचना है। इस योजना के तहत विशेष रूप से 75,000 संभावित गांवों को लक्षित किया गया है, जिनमें से लगभग 8,000 गांव राजस्थान के हैं। इसके साथ ही, 4,000 मौजूदा गांवों में चिलिंग और टेस्टिंग सुविधाओं को भी सुदृढ़ किया जाएगा।
भविष्य की रणनीति पर चर्चा करते हुए अध्यक्ष ने एक महत्वपूर्ण बदलाव की घोषणा की। उन्होंने कहा कि अब प्राथमिकता पशुओं की संख्या बढ़ाने के बजाय ‘प्रति पशु उत्पादकता’ (Yield) में सुधार करने की है। इसके लिए एनडीडीबी अत्याधुनिक तकनीकों जैसे कृत्रिम गर्भाधान (AI), जीनोमिक चिप्स और आईवीएफ (IVF) का व्यापक उपयोग कर रहा है। कृत्रिम गर्भाधान के माध्यम से पशुओं की आनुवंशिक क्षमता को सुधारा जा रहा है, जिसमें एनडीडीबी डेयरी सर्विसेज देश की 40-45% जरूरतों को पूरा कर रही है। जीनोमिक चिप्स जैसी तकनीक से जन्म के समय ही बछड़े की भविष्य की दूध उत्पादन क्षमता का पता लगाया जा सकता है। इसके अलावा, ‘हब और स्पोक’ मॉडल के तहत आईवीएफ तकनीक के जरिए उच्च गुणवत्ता वाली गायों से साल में कई संतानें पैदा की जा रही हैं, जिससे उत्पादकता में तेजी से सुधार हो रहा है।
किसानों की आय बढ़ाने के लिए ‘सेक्स-सॉर्टेड सीमेन’ तकनीक एक मील का पत्थर साबित हो रही है। पहले यह तकनीक महंगी थी, लेकिन एनडीडीबी द्वारा विकसित स्वदेशी तकनीक ने इसकी कीमत ₹1000-1200 से घटाकर मात्र ₹250 कर दी है, जिससे अब 90% से अधिक मादा बछड़े पैदा होने की संभावना सुनिश्चित की जा सकती है। इसके साथ ही, पशु स्वास्थ्य के लिए देशव्यापी टीकाकरण कार्यक्रम भी चलाया जा रहा है, जिसके तहत साल में दो बार एफएमडी (FMD) का मुफ्त टीका दिया जाता है और उसका सारा डेटा ‘भारत पशुधन’ पोर्टल पर डिजिटल रूप से दर्ज किया जाता है। राजस्थान में किसानों को इन वैज्ञानिक तरीकों के प्रति जागरूक करने के लिए “रंगीलो” जैसे पायलट कार्यक्रमों की भी शुरुआत की गई है।
अंत में, अध्यक्ष ने डेयरी क्षेत्र को एक ‘व्हाइट-कॉलर जॉब’ और लाभकारी उद्यमिता के रूप में परिभाषित किया। उन्होंने कहा कि आज डेयरी क्षेत्र भारत की जीडीपी में 4% से 5% का योगदान दे रहा है। परंपरागत ‘गंदा काम’ होने की धारणा को बदलते हुए, अब आधुनिक डेयरी फार्मिंग युवाओं को आकर्षित कर रही है। यदि युवा वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाते हुए 50 पशुओं के साथ डेयरी फार्मिंग शुरू करते हैं, तो वे वार्षिक 1 करोड़ रुपये से अधिक की आय अर्जित कर सकते हैं। एनडीडीबी का उद्देश्य डेयरी को किसानों के लिए एक प्राथमिक व्यवसाय और ‘बीमा’ के रूप में स्थापित करना है, जो प्रतिकूल मौसम में भी उन्हें सुरक्षित आय प्रदान कर सके।


