दिव्यराष्ट्र के लिए लेखाराम बिश्नोई
भारतीय संस्कृति में नववर्ष का आरंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से माना जाता है, जो प्रकृति, अध्यात्म और वैज्ञानिकता का अद्भुत संगम प्रस्तुत करता है। यह दिन केवल एक तिथि परिवर्तन नहीं, बल्कि सृष्टि के नव आरंभ का प्रतीक माना गया है। प्राचीन ग्रंथों के अनुसार इसी दिन ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी, इसलिए इसे अत्यंत पवित्र और मंगलकारी माना जाता है। चैत्र मास के आगमन के साथ ही प्रकृति भी नवजीवन का संदेश देती है। वृक्षों पर नए पत्ते आते हैं, फूल खिलते हैं, वातावरण में मधुरता और नव ऊर्जा का संचार होता है। सर्दी विदा लेती है और गर्मी का प्रारंभ होता है, जिससे यह समय जीवन के संतुलन और अनुकूलता का प्रतीक बन जाता है। यही कारण है कि भारतीय नववर्ष प्रकृति के साथ पूर्ण सामंजस्य स्थापित करता है।
भारतीय कालगणना का आधार विक्रम संवत है, जो इस बार बृहस्पतिवार 19 मार्च से नए हिन्दू नवसंवत्सर 2083 की शुरुआत हो रही है। भारतीय काल गणना में विक्रम संवत का बड़ा महत्व है।जिसका उपयोग प्राचीन काल से ही विवाह, पर्व-त्योहार, शुभ मुहूर्त और धार्मिक अनुष्ठानों के निर्धारण में किया जाता रहा है। यह केवल एक कैलेंडर नहीं, बल्कि खगोल विज्ञान और गणित का अद्भुत उदाहरण है। सूर्य, चंद्रमा और ग्रहों की गति को ध्यान में रखते हुए पंचांग का निर्माण किया जाता है, जिससे समय की सटीक गणना संभव होती है। विशेष बात यह है कि भारतीय पंचांग में पूर्णिमा, अमावस्या, ग्रहण आदि की गणना अत्यंत सटीक होती है। चंद्रग्रहण हमेशा पूर्णिमा को और सूर्यग्रहण अमावस्या को ही होता है—यह वैज्ञानिक सत्य भारतीय कालगणना में पहले से समाहित है। इससे स्पष्ट होता है कि हमारे ऋषियों का खगोल और गणित ज्ञान अत्यंत उच्च स्तर का था।
नवरात्रि का आरंभ भी इसी दिन होता है, जिसमें मां शैलपुत्री की आराधना की जाती है। यह शक्ति, श्रद्धा और साधना का पर्व है, जो जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है। नौ दिनों तक देवी के विभिन्न स्वरूपों की पूजा कर व्यक्ति आत्मशुद्धि और आत्मबल प्राप्त करता है।
भारतीय कालगणना की विशेषता यह भी है कि यह हजारों वर्षों से समान रूप में प्रचलित है।भारतीय पंचांग में अधिमास (मलमास/पुरुषोत्तम मास) चंद्र और सौर वर्ष के अंतर को संतुलित करने के लिए लगभग हर 32–33 महीनों में जोड़ा जाता है।महीनों के नाम पूर्णिमा के दिन चंद्रमा जिस नक्षत्र में होता है, उसके आधार पर तय होते हैं (जैसे चित्रा से चैत्र, विशाखा से वैशाख)। यदि लगातार दो महीनों की पूर्णिमा में चंद्रमा एक ही नक्षत्र में रहे, तो अतिरिक्त महीने को अधिमास कहा जाता है। उदाहरण: ज्येष्ठा नक्षत्र में पुनः पूर्णिमा होने पर “अधिमास ज्येष्ठ” कहलाता है। जबकि पाश्चात्य कैलेंडर में समय-समय पर संशोधन होते रहे हैं। यह दर्शाता है कि भारतीय प्रणाली अत्यंत व्यवस्थित और वैज्ञानिक आधार पर निर्मित है। हमारे ऋषियों ने समय की गणना को केवल गणित तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जीवन, प्रकृति और धर्म से भी जोड़ा।
आज आवश्यकता है कि हम अपनी इस महान परंपरा को समझें और उस पर गर्व करें। भारतीय नववर्ष हमें यह संदेश देता है कि हम भी अपने जीवन में नवीनता, सकारात्मकता और संतुलन लाएं। यह केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और नवसंकल्प का अवसर है।
अंततः, नवसंवत्सर का यह पावन पर्व सभी के जीवन में सुख, समृद्धि और शांति लाए—इसी मंगलकामना के साथ नए वर्ष का स्वागत करना ही भारतीय संस्कृति की सच्ची भावना है।