तत्कालीन मुख्यमंत्री सुखाड़िया जी भी ललित किशोर चतुर्वेदी जी के संगठन कौशल से हतप्रभ रहते, चतुर्वेदी जी के स्थानांतरण के लिए नियम तक बदल डाले … ऐसे थे हमारे #ललितकिशोरचतुर्वेदी जी भाई साहब।
(दिव्यराष्ट्र की विशेष प्रस्तुति)
1940 में संघ के परम् पूजनीय डॉ हेडगेवार जी के विचारों से प्रभावित हुए और 1940 में जब भारत में हैजे की महामारी फैली उस समय प्रो. चतुर्वेदी 10 साल के थे और अनायास ही एक टोली के साथ सेवा कार्य में लग गये बाद में पता लगा वो संघ की टोली थी और उसी टोली में कोटा के ही श्री दुर्गा शंकर जी सोनी के सम्पर्क में आये और 1944 में प्रथम बार उनके साथ शाखा में गए और संघ प्रवेश हुआ।
1948 में महात्मा गांधी की हत्या हुई तो संघ पर भी प्रतिबन्ध लगा उस प्रतिबन्ध में प्रो. चतुर्वेदी प्रथम बार जेल गये। जेल जाने के बाद घर में हडकंप मच गया और नाना श्री आनन्दीलाल जो समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे उन्होने मध्यस्थता कर प्रो. चतुर्वेदी को कहा कि तुम माफी मांग लो हम तुम्हे छुड़ा लेंगे तो प्रो. चतुर्वेदी ने माफी मांगने से साफ इन्कार कर दिया और कहा कि हमने कोई अपराध थोड़े ही किया है जो माफी मांगें सरकार ने तो बिना किसी कारण संघ पर महात्मा गांधी की हत्या का आरोप लगाया है हम इसका विरोध करते है और माफी नही मांगेगे और प्रो. चतुर्वेदी 19 दिन जेल में रहे, विद्यार्थी होने के कारण उन्हें जल्दी रिहा कर दिया गया।
प्रो. चतुर्वेदी की इस दृणता से तत्कालीन सर संघचालक परम पूजनीय गुरु जी जब कोटा आये तो उन्होनें विषेष रूप से चतुर्वेदी को बुला कर उनसे मुलाकात की और उन्हें सराहा।
संघ शिक्षा वर्ग :-
1952 में प्रथम वर्ष,
1953 में द्वितीय वर्ष
1954 में तृतीय वर्ष का संघ शिक्षण वर्ग किया।
1954 में आपकी एम.एस.सी. करते ही भौतिक शास्त्र के व्याख्याता के रूप में नौकरी लगी और प्रथम पोस्टिंग राजकीय कॉलेज, बांसवाड़ा में हुई।
1955 में एक दिन समाचार मिला कि तुरन्त घर चले आओ तुम्हारी शादी है और तुम्हारें आते ही बारात मथुरा जायेगी और कहते है ना कि हर महापुरूष के निर्माण में महिला का योगदान होता है तो 28 जून 1955 मंगलवार को ललित किशोर चतुर्वेदी ने 23 वर्ष की आयु में मुम्बई निवासी श्री छोटेलाल जी चतुर्वेदी की सुपुत्री उर्मिला से इनका विवाह हुआ।
1956 – 1977 कार्यकर्ता काल खण्ड :-
फिजिक्स के प्रोफेसर के रूप में कार्य किया और संघ के स्वयंसेवक व दायित्ववान कार्यकर्ता होने के कारण आपकी 13 वर्ष की नौकरी में 11 बार स्थानान्तरण हुए जिसमें मुख्यतः बांसवाड़ा. डुंगरपुर, जोधपुर, फतेहपुर शेखावाटी, उदयपुर, डीडवाना, कोटा, गंगानगर और अंत में भरतपुर व कोटा (1957) की घटना है।
1957 में विधानसभा चुनाव में उदयपुर से जनसंघ के टिकट पर स्व. श्री भानुकुमार जी शास्त्री तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया से बहुत अधिक मतो से परास्त हुए तो ऐसा समझा जाने लगा की सुखाडिया जी को तो कोई हरा ही नही सकता और सुखाड़िया जी ने घोषणा कर दी की अगले चुनाव में अपने प्रचार के लिए नही आउंगा इस बीच 1959 में ललित जी का स्थानान्तरण कृषि महाविद्यालय उदयपुर में हो गया 1962 में विधानसभा चुनाव आते आते इन 3 सालों में चतुर्वेदी जी ने उदयपुर में इतना संघ का काम और इतने कार्यकर्ता खड़े कर दिये की कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने चुनाव से कुछ महीने पहले सुखाडिया जी को कहा की आपको चुनाव प्रचार में पूरे समय रहना पड़ेगा और अगर ललित चतुर्वेदी का स्थानान्तरण नही किया तो आप चुनाव हार जायेंगे।
सुखाडिया जी ने चतुर्वेदी जी के स्थानान्तरण के लिए विभाग सचिव को बुलाया तो पता लगा उस समय यह नियम था कि कृषि महाविद्यालय के प्रोफेसर का स्थानान्तरण सिर्फ कृषि महाविद्यालय में ही हो सकता है। उस समय उदयपुर के अलावा सिर्फ जोबनेर जयपुर में कृषि महाविद्यालय था । वहां के विधायक को पता लगा की चतुर्वेदी का स्थानान्तरण जोबनेर कृषि महाविद्यालय मे किया जा रहा है तो वह अपने दल बल के साथ सुखाड़िया जी के दफ्तर में आकर अड़ गया कि मेरे क्षेत्र में चतुर्वेदी का स्थानान्तरण नही होगा झक मार कर सुखाड़िया जी को वह नियम बदलना पड़ा और चतुर्वेदी जी का स्थानान्तरण डीडवाना हुआ। फिर भी चतुर्वेदी उदयपुर के कार्यकर्ताओं के सम्पर्क में रहे और सुखाड़िया जी को पूरे समय चुनाव प्रचार में रहना पड़ा और जीतने में पसीने आ गये और सिर्फ कुछ वोटो से वो जीत पाये।
उधर डीडवाना में चतुर्वेदी जी को सम्पूर्ण जोधपुर विभाग का सहविभाग कार्यवाहा का दायित्व दिया गया और उस विभाग में उन्होनें विशाल रूप में संघ का काम खड़ा कर दिया। उस संभाग के कांग्रेस के कार्यकर्ता ललित जी की शिकायत करते कि इनको यहां से हटाओं ये ऐसा संघ का काम खड़ा कर रहा है इतने कार्यकर्ता निर्माण कर दिये है कि हमारी मुश्किल आन पड़ी है। तो सुखाड़िया जी झल्ला कर कहते थे ये जहां जाता है संघ खड़ा कर देता है, कार्यकर्ताओं की फौज खड़ी कर देता है उसके बाद जुलाई 1963 में ललित जी का स्थानान्तरण कोटा कर दिया जाता है वहां के लोग शिकायत करते है तो इस बार सुखड़िया सोचते है जहां जाता है संघ का काम खड़ा कर देता है इस बार इसका स्थानान्तरण लड़कियों के कॉलेज में कर देते है देखते है वहां कैसे संघ का काम खड़ा करता है तो उनका स्थानान्तरण नवम्बर 1964 में गंगानगर बालिका महाविद्यालय में कर दिया जाता है। वहां की प्रधानाचार्य श्रीमती रमा कोचर को निर्देशित कर दिया जाता है कि कॉलेज से बाहर न जा सके। रमा कोचर बड़ी सख्त महिला थी और चतुर्वेदी बडे शालीन थे। योजनाबद्ध तरीके से कार्य करते करते दो कदम आगे बढ़ जाते है कॉलेज में इतना अनुशासन बना दिया कि रमा कोचर प्रभावित हुई और उन्होने चतुर्वेदी को अपना छोटा भाई बना लिया और चतुर्वेदी ने कॉलेज में संघ की सेविका समिति की महिला शाखा खड़ा कर दी।
1966 में जब भरतपुर स्थानान्तरण हो गया तो अचानक एक दिन सांयकाल कोटा विभाग कार्यवाह श्री रघुवीर सिंह जी भरतपुर ललित जी के पास आये और कहा कि आपको माननीय सुन्दर सिंह जी भण्डारी ने दिल्ली बुलाया है। भण्डारी जी उस समय जनसंघ के अखिल भारतीय संगठन मंत्री थे।
प्रातः काल दोनो दिल्ली प्रस्थान कर गये दिल्ली पहुचने पर भण्डारी जी ने कहा ललित जी मुझे राजस्थान में जनसंघ के कार्य व कार्यकर्ता खड़े करने के लिए संगठन मंत्री चाहिए आप नौकरी से त्यागपत्र दे और इस दायित्व को सम्हाले और ललित जी ने किंचीत भी विचार नही किया घर कैसे चलेगा, परिवार का क्या होगा। बस आदेश मानकर त्यागपत्र की स्वीकृति दे भरतपुर चले आये और अगले ही दिन अपना त्यागपत्र लेकर कॉलेज के प्रधानाचार्य श्री महर्षि के सामने पहुंच गये और जनसंघ के लिए नौकरी से अपना त्यागपत्र दे दिया ।
1966 से लेकर 1972 तक गर्मी हो बरसात हो आंधी हो तुफान हो सर्दी हो लु चल रही हो जनसंघ के संगठन मंत्री के रूप में मोटरसाइकिल पर बैठ कर गंगानगर से लेकर बांसवाडा, जैसलमेर – बाडमेर से लेकर भरतपुर राजस्थान के सभी जिलों में जनसंघ के कार्यकर्ताओं की फौज ढाणी-ढाणी में खड़ी कर दी।
1972 संगठन निर्माण में पूरा समय कोटा के बाहर रहने के कारण 1972 में कोटा की दिगोद क्षेत्र से जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़ा और कांग्रेस की नगेन्द्र बाला से चुनाव हार गये पर जोश समाप्त नही हुआ और चुनाव हारने के बाद संगठन को और मजबूत करने की जिम्मेदारी आ गई और जनसंघ राजस्थान के संगठन महामंत्री बना दिये गये और फिर संगठन मजबूती की दिशा तय हो गई और मिशन पर निकल गये ।
1975 आपातकाल
25 जून 1975 को भारतीय राजनीति पर काला ग्रहण आपातकाल लगा कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर ललित जी ने आपातकाल के विरोध में जन-जागरण अभियान चलाया और नानाजी देशमुख को स्कुटर पर बैठाकर जयपुर, किशनगढ़, अजमेर, भीलवाड़ा, चितौड़ और उदयपुर में भुमिगत कार्यकर्ताओं के साथ बैठकें की और विरोध की योजना बनाई और उस पर अमल किया और अगस्त 1975 को गिरफ्तार कर लिये गये और कोटा जेल में रहे। जेल में अपराधी और आपातकाल के बन्दियों को एक ही सेल में रखा जाता था उसके विरोध में जेलर के सामने भूख हडताल पर बैठ गये हमें अलग सेल में रखा जाए, जेल में स्वतंत्र घूमने की इजाजत हो, पढने के लिए किताबे और खेलने के लिए बालीवाल उपलब्ध कराई जाए। जेलर को बात माननी पड़ी और फिर जेल में स्वतंत्र रूप से घुमने और खेलने लगे। जेल में सायंम शाखा नियमित लगाते थे।
1977 जयप्रकाश नारायण जी आन्दोलन के बाद 21 मार्च 1977 को आपातकाल हटा और जेल से रिहा हुए तो शहर में विजेताओं जैसा स्वागत हुआ और चुनाव की घोषणा हो गई ललित जी को कोटा शहर से जनसंघ के टिकट पर चुनाव लडवाया गया और ललित जी 3000 के खर्चे में चुनाव जीते।
1977 से 2000 विधायक कालखण्ड :- 1977 में पहली ही बार में मंत्री बने और वो भी केबिनेट और 8 विभाग आपको मिले ।
1980 मध्यावती चुनाव हुआ और पुनः कोटा से विधायक बने और भाजपा के महामंत्री के रूप में संगठन का काम करने लगें।
कहते है कि आपकी चाय बीकानेर के कार्यकर्ताओं के साथ होती थी. दोपहर का भोजन जोधपुर के कार्यकर्ताओं के साथ और रात्रि का भोजन उदयपुर के कार्यकर्ताओं के साथ होता था और अगले दिन प्रातः उसी स्फूर्ती के साथ जयपुर में अपने निवास पर कार्यकर्ताओं से मिलते थे और समस्या को सुलझाते हुए देखा जा सकता था।
1984 से 1985 दुखद घटनाऐं विधानसभा जीत पर केस लगा तो विधायक रहते हुए विधायक नही रहे फिर कोर्ट से जीते और वापस 90 में चुनाव लड़ा।
1987 में दामाद की दुर्घटना हो गई मरणासन्न होते होते बचे।
1987 मां की मृत्यु हो गई।
1987 स्वयं की बाईपास सर्जरी हुई।
1987-89 तक आप भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष रहे। शीर्ष नेतृत्व से खटपट होने के बाद उन्होनें तय किया की मेरे मुंह से कुछ अपशब्द न निकले उसके लिए आपने 7 दिन मौन धारण कर जिसमें से प्रथम 3 दिन आपने अपने आप को ध्यान में लगा कर अज्ञात में रखा और किसी से भी नही मिले।
1990 चुनाव भारी मतो से जीत कर शिक्षा, सार्वजनिक निर्माण व चिकित्सा मंत्री बने।
1991 में चतुर्वेदी जी ने अपने सिविल लाइन्स वाले निवास पर विशाल भागवत कथा का आयोजन किया।
*1991 में बारां को जिला बनाने में प्रो. चतुर्वेदी का प्रमुख योगदान रहा**
1992 में आपने मरीजो का मुफ्त इलाज का कार्य निर्धन रोगी उपचार प्रकल्प शुरू किया ।
1992 राम मन्दिर निर्माण मंत्री पद त्यागपत्र जोगश्वर गर्ग, सतीश जी पुनिया और हजारों कार्यकर्ता गये उनमें एक मेरी बड़ी बहन उषा चतुर्वेदी भी थी जो गुम्बज तक गई थी और वहां से वो ढांचा ढहाया गया था उसकी एक ईंट भी लेकर आयी थी। कई दिनों तक कार्यकर्ता और ललित भूखे रहे पर सफल होकर आये थे ।
1993 में चुनाव जीत कर उच्च व तकनीकि शिक्षा व सार्वजनिक निर्माण मंत्री (कैबीनेट मंत्री) बने 1998 तक मंत्री रहे ।
1994 में ललित जी के द्वारा देश में पहली बार किसी मंत्री द्वारा बनाई गई सड़क नीति बनाई जिसको उन्होनें 1994 में मंत्रीमण्डल की स्वीकृति के लिए प्रस्तुत किया जिसमें कई बातें प्रमुख थी।
1997 करौली को जिला बनाने में आपका प्रमुख योगदान रहा । 1998 चुनावों में ऐन्टी इनकम्बेन्सी की हवा चली और भाजपा पुरे राजस्थान में चुनाव हार गई जिसमें ललित किशोर चतुर्वेदी भी शामिल थे।
1999 से 2000 फिर संगठन के कार्य में लग गयें।
इस 21 सालों में ललित जी ने अपने पूरे दल बल के साथ कोई 21 बार गोर्वधन जी की परिक्रमा लगाई अब मै आपको बताता हूं कि ये स्वर्णिम काल क्यो है।
ललित चतुर्वेदी कोटा से चुनाव जीत कर संयुक्त दलो की सरकार में भैरोंसिंह शेखावत की सरकार में प्रथम बार में ही प्रमुख विभागों के कैबिनेट मंत्री बने और लगातार 1980, 1985, 1990, 1993 यानि लगातार 21 साल कोटा से विधायक रहे।
01. बिजली मंत्री के रूप में आपने राजस्थान में बिजली के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए अनेको ग्रिड स्टेशनों की नींव रखी और शुरू करवाये।
02. सार्वजनिक निर्माण मंत्री के रूप में आपने राजस्थान में सड़कों का जाल बिछा दिया और प्रदेश के लगभग सभी प्रमुख धार्मिक स्थलों को सड़कों से जोड़ दिया।
03. चिकित्सा मंत्री रहते हुए हजारों सरकारी अस्पताल, डिस्पेंसरिया व प्राथमिक चिकित्सालय प्रारम्भ कराये कई भामाशाहों द्वारा अस्पतालों के भवनों का निर्माण कराया।
04. सिंचाई मंत्री रहते हुए नहरों की मरम्मत, नई नहरों का निर्माण, कई छोटे-बड़े बांधों का निर्माण कराया।
05. तकनीकि व उच्च शिक्षा मंत्री रहते हुए राजस्थान में युवाओं की प्रतिभा को निखारने के लिए हजारों आई.टी. आई. महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, प्रत्येक जिला मुख्यालय पर महिला महाविद्यालय, पोलिटेक्निक कॉलेज, कृषि महाविद्यालय, आयुर्वेद महाविद्यालय व रोजगार उन्मुख शिक्षा के केन्द्र प्रारम्भ कराये ।
06. शिक्षा मंत्री रहते हुए नये नये विद्यालय, बालिका विद्यालय, विद्यालयों को क्रमोन्नत व शिक्षकों को कई तरह के अधिकार दिलवाये।
07. विज्ञान व प्रौद्योगिक मंत्रालय के माध्यम से कई रिसर्च केन्द्र, लैब व साइन्स लाइब्रेरी को आरम्भ कराया ।
08. इन 21 सालों में 11 साल विद्युत, सिंचाई, शिक्षा, उच्च शिक्षा, विज्ञान व प्रोद्योगिकी तकनीकि शिक्षा, स्वायत्त शासन, चिकित्सा, सार्वजनिक निर्माण, ऊर्जा, नहर व बांध विभाग प्रमुख रहे और अनगिनत विकास कार्य करवाये ।
09. जयपुर की ये नई विधानसभा इसका पूरा नक्शा 1998 में PWD द्वारा बना कर दिया गया था और शायद भैरोंसिंह जी शेखावत व ललित किशोर चतुर्वेदी द्वारा इसका शिलान्यास भी हो चुका था ।
*2003 में प्रो. चतुर्वेदी जी पुनः भाजपा राजस्थान के प्रदेश अध्यक्ष बने**
2006 में ही आपने अपने जीवन के 75 वर्ष पुरे किये और जयपुर, कोटा, उदयपुर आदि कई स्थानों पर आपके अमृत महोत्सव मनाये गये सबसे विशाल अमृत महोत्सव जयपुर के बिडला सभागार में हुआ जिसमें तत्कालीन सर संघचालक सुर्दशन जी तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुन्धरा गुलाबचन्द कटारिया, और निम्बार्क संत श्री जी महाराज उपस्थित रहे।
2006 में चतुर्वेदी ने अपना अध्यक्षीय दो वर्ष का कार्यकाल पूरा किया और राज्यसभा के काम में लग गये। ललित चतुर्वेदी प्रभावी व्यक्तित्व से सम्पन्न कार्यकर्ता थे। वे राजनेता कम सेवक ज्यादा थे। उनका 51 वर्ष का राजनीतिक जीवन बेदाग रहा।
5 अप्रैल 2015 में उनका देवलोक गमन हुआ।