इतिहास के हाशिये पर एक क्रांतिकारी फकीर
मजनू शाह मलंग मदारी और अधूरा राष्ट्रीय कर्ज़

भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल 1857 या 1920 के बाद शुरू नहीं हुआ था। अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ प्रतिरोध की जड़ें उससे कहीं गहरी और व्यापक हैं। दुर्भाग्यवश, हमारा औपचारिक इतिहास उन शुरुआती संघर्षों और संघर्षकर्ताओं के साथ न्याय नहीं कर पाया, जो सत्ता के ढांचे से बाहर रहकर लड़े। हज़रत मजनू शाह मलंग मदारी ऐसे ही एक क्रांतिकारी थे, सूफ़ी फकीर, मलंग और अंग्रेज़ी साम्राज्य के लिए तीन दशकों तक सिरदर्द बने विद्रोही।
मजनू शाह मलंग का जन्म हरियाणा के मेवात क्षेत्र में हुआ। वे ‘मलंग’ थे, भटकने वाले सूफ़ी फकीर, जिनका जीवन किसी एक भूभाग या पहचान तक सीमित नहीं होता। उन्होंने उत्तर प्रदेश के कानपुर ज़िले के मकनपुर में मदारिया सिलसिले के प्रमुख संत हज़रत बदीउद्दीन ज़िंदा शाह मदार से दीक्षा ली। आगे चलकर बंगाल के दीनाजपुर ज़िले में उन्होंने मदारिया फकीरों का नेतृत्व संभाला और वहीं से अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ संगठित प्रतिरोध की नींव पड़ी।
अंग्रेज़ों ने इस आंदोलन को तिरस्कार में ‘पागलपंथी’ कहा, लेकिन हकीकत यह थी कि यह आंदोलन ब्रिटिश शासन के लिए अत्यंत खतरनाक था। इसकी सबसे बड़ी ताक़त यही थी कि इसके योद्धा—फकीर और मलंग, न किसी स्थायी ठिकाने से बंधे थे, न किसी सत्ता-संरचना से। वे गांव-गांव जाकर ईस्ट इंडिया कंपनी की दमनकारी नीतियों, भारी करों और शोषण के खिलाफ जनता को जागरूक करते थे। बंगाल से लेकर उत्तर प्रदेश तक मजनू शाह मलंग का प्रभाव फैल चुका था।
इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि मजनू शाह मलंग अंग्रेजों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाते थे। अचानक हमले, तेज़ी से स्थान परिवर्तन और स्थानीय समर्थन….यह सब अंग्रेज़ी सेना के लिए नई और असहज स्थिति थी। उन्हें पकड़ने और उनके प्रतिरोध को कुचलने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी ने विशेष रूप से लेफ्टिनेंट ब्रेनन को नियुक्त किया।
8 दिसंबर 1786 को मजनू शाह मलंग को गोली मारकर गंभीर रूप से घायल किया गया। घायल अवस्था में भी वे अंग्रेजों को चकमा देकर कानपुर के मकनपुर पहुंचे, जहां उन्हें स्थानीय लोगों ने शरण दी। लेकिन चोटें जानलेवा थीं और 26 जनवरी 1787 को उनका इंतकाल हो गया।
यह तथ्य अपने आप में सवाल खड़ा करता है कि जो व्यक्ति 18वीं सदी में अंग्रेज़ी सत्ता को चुनौती दे रहा था, जिसे अंग्रेज़ी अभिलेखों में खतरनाक विद्रोही माना गया, वह आज भारत में लगभग गुमनाम क्यों है?
विडंबना यह है कि जिस मजनू शाह मलंग को भारत भुला चुका है, बांग्लादेश में वही आज भी एक क्रांतिकारी नायक के रूप में सम्मानित हैं। उनकी संघर्षगाथा वहां के साहित्य और लोककथाओं में सुरक्षित है। उन पर फिल्में बनी हैं और हाल के वर्षों में बांग्लादेश सरकार ने एक महत्वपूर्ण पुल का नाम मजनू शाह मलंग के नाम पर रखकर उन्हें राष्ट्रीय श्रद्धांजलि दी है।
यह स्थिति हमें आत्ममंथन के लिए मजबूर करती है। क्या हमारा स्वतंत्रता संग्राम केवल उन्हीं तक सीमित है, जो औपनिवेशिक प्रशासन की फाइलों में “मान्य” थे..?
क्या सूफ़ी फकीरों, आदिवासी नेताओं और लोकनायकों का संघर्ष स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा नहीं था..?
आज आवश्यकता है कि मजनू शाह मलंग मदारी जैसे व्यक्तित्वों को इतिहास के हाशिये से निकालकर केंद्र में लाया जाए। उन्हें औपचारिक रूप से स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा, उनके जीवन पर शोध, और पाठ्यक्रमों में समुचित स्थान मिलना चाहिए। यह केवल एक व्यक्ति को सम्मान देने का प्रश्न नहीं है, बल्कि उस व्यापक जनसंघर्ष को स्वीकार करने का प्रश्न है, जिसने भारत की आज़ादी की नींव रखी।
क्योंकि इतिहास का कर्ज़ तब तक नहीं उतरता, जब तक हम उन फकीरों को भी याद न करें,
जिन्होंने बिना ताज, बिना तलवार और बिना सत्ता के
एक साम्राज्य को चुनौती दी।
(लेखक सूफी विचारक हैं, शाह(फकीर) समाज के उत्थान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एकजुटता एवं जागरूकता हेतु कार्यरत हैं।)*