दिव्यराष्ट्र, मुंबई: मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल के कारण भारतीय शेयर बाजारों में अस्थिरता का दौर देखा जा रहा है। इन हालातों ने वैश्विक वित्तीय बाजारों में कुछ समय के लिए अनिश्चितता तो पैदा की है, लेकिन भारत के ‘मैक्रोइकॉनॉमिक फंडामेंटल्स’ (बुनियादी आर्थिक आधार) अब भी मजबूत बने हुए हैं। इसे मजबूत घरेलू खपत, बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) पर भारी खर्च और कंपनियों की बेहतर होती बैलेंस शीट से काफी समर्थन मिल रहा है। प्रभुदास लीलाधर की वेल्थ मैनेजमेंट इकाई पीएल वेल्थ ने अपनी ताजा रिपोर्ट मार्केट आउटलुक – मार्च 2026 में कहा है कि आने वाले समय में बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है, क्योंकि निवेशक लगातार भू-राजनीतिक घटनाओं और कमोडिटी की कीमतों पर नजर बनाए हुए हैं। हालांकि, भारत का व्यापक आर्थिक माहौल काफी लचीला है, जो लंबी अवधि के लिए भारतीय इक्विटी बाजार के आकर्षण को और मजबूत करता है।
पीएल वेल्थ मैनेजमेंट के सीईओ, इंदरबीर सिंह जॉली ने कहा, “बाजार में अस्थिरता आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है,
खासकर तब जब वैश्विक स्तर पर भू-राजनीतिक जोखिम बढ़ जाते हैं। हालांकि, भारत के आर्थिक बुनियादी ढांचे मजबूत हैं। जारी इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, स्थिर खपत और कंपनियों की मजबूत बैलेंस शीट लंबी अवधि के विकास के लिए एक ठोस आधार प्रदान करती है। निवेशकों के लिए, ऐसे दौर अक्सर अच्छी क्वालिटी वाली कंपनियों को सही दाम (उचित वैल्यूएशन) पर खरीदने का मौका देते हैं।”
वैश्विक अनिश्चितता का बाजार के सेंटिमेंट पर असर : हाल के दिनों में वैश्विक बाजारों में घबराहट बढ़ी है, क्योंकि मध्य पूर्व के तनाव ने कच्चे तेल की कीमतों को ऊपर धकेल दिया है। इससे महंगाई बढ़ने और ग्लोबल ग्रोथ सुस्त होने की चिंताएं पैदा हुई हैं। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर काफी निर्भर है, इसलिए तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से महंगाई और रुपये की चाल प्रभावित हो सकती है। हालांकि, बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के वैश्विक झटके ऐतिहासिक रूप से केवल कुछ समय के लिए बाजार में ‘करेक्शन’ (गिरावट) लाते हैं, न कि लंबे समय की मंदी। विशेषकर उन अर्थव्यवस्थाओं में जहां घरेलू मांग और सरकारी नीतियां मजबूत हों, वहां सुधार जल्दी आता है।
घरेलू अर्थव्यवस्था से मिल रहा है मजबूत सहारा : वैश्विक चुनौतियों के बावजूद, भारत का घरेलू आर्थिक माहौल काफी
अनुकूल बना हुआ है। सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) पर किया जा रहा खर्च विकास का मुख्य इंजन रहा है,
जिसने इंजीनियरिंग, कंस्ट्रक्शन और कैपिटल गुड्स जैसे क्षेत्रों में निवेश को गति दी है। साथ ही, मैन्युफैक्चरिंग गतिविधियां
लगातार बेहतर हो रही हैं, जबकि शहरी और ग्रामीण दोनों बाजारों में खपत स्थिर बनी हुई है। पिछले कुछ वर्षों में कंपनियों की बैलेंस शीट्स काफी मजबूत हुई हैं, जिससे उन्हें निवेश और विस्तार के लिए अधिक वित्तीय लचीलापन मिला है।
भारत के बैंकिंग सेक्टर में भी बड़ा बदलाव देखा गया है। एसेट क्वालिटी में सुधार और कर्ज की स्थिर मांग ने व्यापक निवेश चक्र को मजबूती दी है।
मुनाफे में बढ़त तो है, लेकिन अब ‘पिक एंड चूज’ का समय : पिछले एक साल में कई सेक्टर्स में कंपनियों के मुनाफे में लगातार सुधार दिखा है, जिसे बेहतर परिचालन क्षमता और पूंजी के सही आवंटन का साथ मिला है। हालांकि, सभी सेक्टर्स में कमाई की स्थिति एक जैसी नहीं रही है। इससे संकेत मिलता है कि अब बाजार का रिटर्न पूरे सेक्टर के बजाय चुनिंदा शेयरों पर ज्यादा निर्भर करेगा।
इंदरबीर सिंह जॉली ने आगे कहा, “आज के बाजार माहौल में सही शेयरों का चुनाव ही सफलता की कुंजी है। निवेशकों को उन कंपनियों पर फोकस करना चाहिए जिनकी बैलेंस शीट मजबूत हो, कमाई का रास्ता साफ हो और जो बाजार में अपनी बढ़त बनाए रखने में सक्षम हों। अब केवल ‘मोमेंटम’ के पीछे भागने के बजाय क्वालिटी और अनुशासन पर ध्यान देना ज्यादा जरूरी होगा।”
वैल्यूएशन में दिख रहा है लंबी अवधि का भरोसा
भारतीय शेयर बाजार कई अन्य उभरते बाजारों की तुलना में अपने ऐतिहासिक औसत से ऊपर के वैल्यूएशन पर ट्रेड कर रहे हैं। यह ‘वैल्यूएशन प्रीमियम’ भारत की लंबी अवधि की विकास यात्रा पर निवेशकों के अटूट विश्वास को दर्शाता है। साथ ही, यह संस्थागत और खुदरा दोनों निवेशकों की ओर से बाजार में लगातार आ रहे फंड फ्लो का भी प्रमाण है।
हालांकि बाजार के कुछ हिस्से महंगे लग सकते हैं, लेकिन कमाई की स्पष्ट संभावना और घरेलू निवेशकों की निरंतर भागीदारी से बाजार में स्थिरता बनी रहने की उम्मीद है। नतीजतन, बाजार में उतार-चढ़ाव के दौर लंबी अवधि के निवेशकों के लिए बुनियादी रूप से मजबूत कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के आकर्षक अवसर साबित हो सकते हैं।
सेक्टर के स्तर पर अवसर काफी व्यापक हैं
विभिन्न क्षेत्रों की बात करें तो फाइनेंशियल सेक्टर भारतीय शेयर बाजारों का मुख्य ड्राइवर बना हुआ है। कर्ज की मजबूत
मांग, सुधरती एसेट क्वालिटी और बैंकिंग सेवाओं के बढ़ते दायरे से बैंकों और वित्तीय संस्थानों के मुनाफे में अच्छी बढ़त की उम्मीद है। इंफ्रास्ट्रक्चर और कैपिटल गुड्स कंपनियां भी फायदे में हैं, क्योंकि सरकार का पूरा जोर बुनियादी ढांचे के विकास और पूंजीगत खर्च बढ़ाने पर है।
ऑटोमोबाइल सेक्टर को मजबूत घरेलू मांग, प्रीमियम वाहनों की ओर बढ़ते झुकाव और निर्यात के बेहतर मौकों से लाभ
मिल रहा है। वहीं, बढ़ती आय और शहरीकरण के चलते उपभोक्ता-केंद्रित व्यवसाय भी आकर्षक बने हुए हैं। इसी तरह,
आईटी सेक्टर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटलाइजेशन के कारण बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। हालांकि,
वैश्विक स्तर पर टेक खर्च में उतार-चढ़ाव आ सकते हैं, लेकिन डिजिटल सेवाओं की लंबी अवधि की मांग मजबूत बनी हुई है। हेल्थकेयर, एनर्जी और यूटिलिटीज जैसे ‘डिफेंसिव सेक्टर्स’ बाजार की अनिश्चितता के समय पोर्टफोलियो को स्थिरता दे सकते हैं।
अस्थिर माहौल में निवेश की रणनीति
मौजूदा माहौल में विशेषज्ञ एक डाइवर्सिफाइड पोर्टफोलियो बनाए रखने की सलाह देते हैं, जिसमें उन सेक्टर्स पर फोकस हो जहां कमाई की स्पष्ट संभावना हो। फाइनेंशियल और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर भारत की आर्थिक तरक्की से सीधे जुड़े होने के कारण पोर्टफोलियो का मुख्य हिस्सा होने चाहिए। खपत से जुड़े व्यवसायों और अच्छी इंडस्ट्रियल कंपनियों में चुनिंदा निवेश बेहतर मौके दे सकता है, जबकि हेल्थकेयर और यूटिलिटीज जैसे सेक्टर उतार-चढ़ाव के दौरान पोर्टफोलियो को संतुलित रखने में मदद करेंगे।