जयपुर दिव्यराष्ट्र/ राजस्थान विश्वविद्यालय के महाराजा और महारानी कॉलेज का अधिकार दशकों से राजस्थान विश्वविद्यालय के अधीन चला आ रहा है, पिछले दिनों अचानक इन दोनों महाविद्यालयों का राजस्व रिकॉर्ड में स्वामित्व जयपुर विकास प्राधिकरण एवं नगर निगम को दिए जाने के निर्णय का विश्वविद्यालय समुदाय ने कड़ा विरोध किया है, व इन दोनों महाविद्यालयों का स्वामित्व राजस्थान विश्वविद्यालय को पुनः दिए जाने की मांग की है,
बिशन सिंह शेखावत शोध एवं शिक्षण संस्थान के अध्यक्ष एवं राजस्थान विश्वविद्यालय में जनसंपर्क अधिकारी रहे डॉ भूपेंद्र सिंह शेखावत ने इस संबंध में कुलपति को पत्र लिखकर तुरंत प्रभाव से विश्वविद्यालय सिंडिकेट की एक विशेष बैठक आयोजित कर इस संबंध में राज भवन व राजस्थान सरकार को विरोध स्वरूप एक प्रस्ताव पारित कर भेजे जाने की मांग की है
उल्लेखनीय है कि राजस्थान विश्वविद्यालय से जुड़ी किसी भी संपदा का स्थानांतरण किसी दूसरी संस्था को किए जाने से पूर्व विश्वविद्यालय सिंडिकेट की अनुमति अनिवार्य रूप से आवश्यक है, लेकिन इन दोनों महाविद्यालयों के स्वामित्व का हस्तांतरण जेडीए व नगर निगम को किए जाने से पूर्व न तो विश्वविद्यालय प्रशासन को कोई जानकारी दी गई और ना ही विश्वविद्यालय की सिंडिकेट की आवश्यक अनुमति प्राप्त की गई है, इस कारण विधि की दृष्टि से भी यह कार्यवाही किसी भी रूप में उचित नहीं समझी जा सकती है,
विश्वविद्यालय पेंशनर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रोफेसर सोमदेव ने इस संबंध में कहा है कि यदि राज्य सरकार इस अवैध रूप से स्थानांतरण के संबंध में शीघ्र ही कोई कार्यवाही नहीं करती है तो एक जनहित याचिका पेंशनर एसोसिएशन की ओर से दायर की जाएगी
राजस्थान विश्वविद्यालय से जुड़े विभिन्न कर्मचारी संगठन व अन्य स्वयंसेवी संस्थाएं संयुक्त रूप से एक बड़ा आंदोलन इस संबंध में प्रारंभ किए जाने पर भी विचार कर रहे हैं
विश्वविद्यालय के शिक्षकों एवं कर्मचारियों ने इस संबंध में व्यक्तिगत रूप से राज्य के मुख्यमंत्री एवं राज्यपाल को विरोध स्वरूप पत्र लिखे जाने का सिलसिला भी प्रारंभ कर दिया है
डॉ शेखावत के अनुसार एक तरफ राज्य सरकार उच्च शिक्षा के संबंध में बजट प्रस्तावों में अनेक प्रावधान कर रही है दूसरी ओर राजस्थान के सबसे बड़े उच्च शिक्षण संस्थान को ऐसे निर्णय के आधार पर स्पष्ट रूप से संकुचित एवं कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है जिसे किसी भी रूप में उचित नहीं कहा जा सकता है, उन्होंने आगे कहा है कि राजस्थान विश्वविद्यालय को कमजोर करने का अर्थ है राज्य मैं व्यावसायिक लाभ के आधार पर संचालित हो रही संस्थाओं को प्रोत्साहित करने का एक खुला अवसर प्रदान करना है, जो राज्य में उच्च शिक्षा के लिए संसाधनों के अभाव में वंचित परिवारों से जुड़े युवाओं के लिए किसी भी रूप में उचित नहीं कहा जा सकता है
पूर्व में भी राजस्थान विश्वविद्यालय को दो चरणों में आवंटित भूमि पर इसी तरह अतिक्रमण एवं अनाधिकृत रूप से अधिकार जताने के प्रयास किए गए , लेकिन इस विश्वविद्यालय के प्रति आत्मिक रूप से सम्मान करने वाले मीडिया समूहों स्वयंसेवी संस्थाओं और विश्वविद्यालय से जुड़े कर्मचारी एवं शिक्षक संगठनों द्वारा इसके विरोध में चलाए गए व्यापक अभियान के कारण इसमें सफलता हासिल नहीं हो सकी व राजस्थान विश्वविद्यालय को दो चरणों में आवंटित 365 एकड़ भूमि के विशाल भूभाग के एक बड़े भूभाग को ,जिसमें राजस्थान विश्वविद्यालय मुख्य परिसर से जुड़ा विशाल क्षेत्र शामिल है , विश्वविद्यालय के स्वामित्व में लाया जाना संभव हो सका
इस संबंध में उन्होंने स्पष्ट किया है कि यदि महारानी कॉलेज जैसे महिला कॉलेज का अधिकार नगर निगम या ऐसी किसी अन्य संस्था को दे दिया गया तो नगर निगम यहां सफाई कर्मचारियों, के न केवल कार्यालय ही खुलेगा, वरन ऐसी ही अन्य गतिविधियों का केंद्र भी बन जाएगा जिससे छात्राओं का अध्ययन भी प्रभावित होगा अत सरकार को जल्दी बाजी में की गई इस अदूरदर्शिता पूर्ण की गई अवैध कार्यवाही को तुरंत प्रभाव से निरस्त करना चाहिए।