दिव्यराष्ट्र के लिए सुनील चाष्टा सुरुप अखिल भारतीय साहित्य परिषद जिला सलूम्बर
‘शिव की महान रात्रि महाशिवरात्रि का त्यौहार भारत के आध्यात्मिक उत्सवों में सबसे महत्वपूर्ण है।
परमतत्व की चाह करने वालो के लिए महाशिवरात्रि बहुत महत्वपूर्ण है। यह रात चैतन्य जागृति की रात है। जब प्रकृति मनुष्य को उसके आध्यात्मिक शिखर तक जाने में मदद करती है पूरी रात मनाए जाने वाले इस उत्सव में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि ऊर्जाओं के प्राकृतिक प्रवाह को उमड़ने का पूरा अवसर मिले।
महाशिवरात्रि आध्यात्मिक पथ पर चलने वाले साधकों के लिए बहुत महत्व रखती है। यह उनके लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है जो पारिवारिक परिस्थितियों में हैं और संसार की महत्वाकांक्षाओं में मग्न हैं। पारिवारिक परिस्थितियों में मग्न लोग महाशिवरात्रि को शिव के विवाह के उत्सव की तरह मनाते हैं। सांसारिक महत्वाकांक्षाओं में मग्न लोग महाशिवरात्रि को शिव के द्वारा अपने शत्रुओं पर विजय पाने के दिवस के रूप में मनाते हैं। परंतु साधकों के लिए यह वह दिन है जिस दिन वे कैलाश पर्वत के साथ एकात्म हो गए थे। वे एक पर्वत की भाँति स्थिर व निश्चल हो गए थे। यौगिक परंपरा में शिव को किसी देवता की तरह नहीं पूजा जाता।
उन्हें आदि गुरु माना जाता है अर्थात पहले गुरु जिनसे ज्ञान उपजा। ध्यान की अनेक सहस्राब्दियों के पश्चात् एक दिन वे पूर्ण रूप से स्थिर हो गए। वही दिन महाशिवरात्रि का था। उनके भीतर की सारी गतिविधियाँ शांत हुईं और वे पूरी तरह से स्थिर हुए, इसलिए साधक महाशिवरात्रि को स्थिरता की रात्रि के रूप में मनाते हैं।
शिवरात्रि माह का सबसे अंधकारपूर्ण दिवस होता है। । शिव का शाब्दिक अर्थ है‘जो नहीं है’। जो है’ वह अस्तित्व और सृजन है। जो नहीं है’ वह शिव है। जो नहीं है उसका अर्थ है, अगर आप अपनी आँखें खोल कर आसपास देखें और आपके पास सूक्ष्म दृष्टि है तो आप बहुत सारी रचना देख सकेंगे। अगर आपकी दृष्टि केवल विशाल वस्तुओं पर जाती है, तो आप देखेंगे कि विशालतम शून्य ही अस्तित्व की सबसे बड़ी उपस्थिति है। कुछ ऐसे पिंड जिन्हें हम आकाशगंगा कहते हैं वे तो दिखाई देते हैं, परंतु उन्हें थामे रहने वाली विशाल शून्यता सभी लोगों को दिखाई नहीं देती। इस विस्तार इस असीम रिक्तता को ही शिव कहा जाता है। वर्तमान में आधुनिक विज्ञान ने भी साबित कर दिया है कि सब कुछ शून्य से ही उपजा है और शून्य में ही विलीन हो जाता है। इसी संदर्भ में शिव यानी विशाल रिक्तता या शून्यता को ही महादेव के रूप में जाना जाता है। इस ग्रह के प्रत्येक धर्म व संस्कृति में सदा दिव्यता की सर्वव्यापी प्रकृति की बात की जाती रही है। यदि हम इसे देखें तो ऐसी एकमात्र चीज़ जो सही मायनों में सर्वव्यापी हो सकती है ऐसी वस्तु जो हर स्थान पर उपस्थित हो सकती है वह केवल अंधकार शून्यता या रिक्तता ही है।अंधकार का कोई स्त्रोत नहीं है। यह अपने आप में एक स्त्रोत है। यह सर्वत्र उपस्थित है। तो जब हम शिव कहते हैं तब हमारा संकेत अस्तित्व की उस असीम रिक्तता की ओर होता है। इसी रिक्तता की गोद में सारा सृजन घटता है। रिक्तता की इसी गोद को हम शिव कहते हैं।
महाशिवरात्रि एक अवसर और संभावना है, जब आप स्वयं को हर मनुष्य के भीतर बसी असीम रिक्तता के अनुभव से जोड़ सकते हैं जो कि सारे सृजन का स्त्रोत है। एक ओर शिव संहारक कहलाते हैं और दूसरी ओर वे सबसे अधिक करुणामयी भी हैं ।उनकी करुणा के रूप विलक्षण और अद्भुत रहे हैं। इस प्रकार महाशिवरात्रि कुछ ग्रहण करने के लिए भी एक विशेष रात्रि हैं इस रात में कम से कम एक क्षण के लिए उस असीम विस्तार का अनुभव करें जिसे हम शिव कहते हैं। यह केवल एक नींद से जागते रहने की रात भर न रह जाए यह जागरण की रात्रि होनी चाहिए चेतना व जागरूकता से भरी एक रात।