(दिव्यराष्ट्र के लिए डॉ. सीमा दाधीच)
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी सबसे पवित्र रात्रि है, जो भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन तथा शिव के निराकार से साकार (लिंग) रूप में प्रकट होने का प्रतीक है, यह महान् रात्रि महाशिवरात्रि कही गई यह रात्रि अज्ञान और अंधकार से निकलकर ज्ञान और शिवत्व की आराधना में लीन होने की रात्रि है। महाशिवरात्रि वह रात है जब भगवान शिव ने सृष्टि के पालन और संहार का ब्रह्मांडीय नृत्य किया था यह नृत्य ब्रह्मांड के निरंतर चक्र और समस्त अस्तित्व के पीछे परम वास्तविकता के रूप में शिव की शक्ति का प्रतीक है। यह रात्रि समाज में चेतना और ऊर्जा संतुलन अर्थात् पुरुष और स्त्री शक्ति के संतुलन और सामंजस्य से सुदृढ़ समाज के निर्माण का प्रारंभ है जो सृष्टि में नई ऊर्जा का संचालन का प्रतीक है।शिवपुराण के अनुसार महाशिवरात्रि पर शिव एक विशाल अग्नि स्तंभ (लिंग) के रूप में प्रकट हुए थे और महाशिवरात्रि भगवान शिव और देवी पार्वती के विवाह का प्रतीक है। शिवरात्रि पर ऐसा माना जाता है कि इसी दिन भगवान शिव ने समुद्र मंथन से उत्पन्न विष (हलाहल) का सेवन किया था, जिससे उन्होंने ब्रह्मांड का उद्धार किया था। जब देवता-राक्षस अमृत के लिए मंथन कर रहे थे, तब यह विष निकला। शिव ने इसे कंठ में रोक लिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए। यानि जब किसी कार्य का आरम्भ होता है तो बहुत ही कड़ी मेहनत का सफर तय करते समय असफलता के काफी कड़वे घूंट पीने पड़ते है व्यक्ति निरंतर प्रयास करें और अपने कार्यों पर ही ध्यान देकर आगे बढ़ता जाए यही शिव का वर्तमान युग का हलहाल विष है जो शिव आराधना से मनुष्य को सीखना चाहिए। शिव पुराण (रुद्र संहिता) ,स्कंद पुराण इस पुराण के अनुसार, जो व्यक्ति महाशिवरात्रि पर उपवास कर बिल्व पत्रों से शिव की पूजा करता है और रात्रि भर जागता (जागरण) है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।
गरुड़ पुराण, देवी भागवत पुराण में महाशिवरात्रि को एक अत्यंत पावन और फलदायी व्रत माना गया है। व्रत का पालन जीवन में ज्ञान प्राप्ति के लिए समर्पण का भाव बताती है। इन ग्रंथों के अनुसार, यह रात्रि शिवभक्तों के लिए आध्यात्मिक जागृति और नकारात्मकता से मुक्ति पाने का सबसे बड़ा अवसर है क्योंकि रात्रि का अर्थ है ‘शरण लेना ‘ मान्यताओं के अनुसार, इस रात्रि को ब्रह्मांड के द्वार खुले होते हैं और ऊर्जा का प्रवाह सर्वोच्च स्तर पर होता है, जो ध्यान के लिए सर्वोत्तम है। शिव को गहन शांति और चेतना से जोड़ा जाता है और रात्रि की शांति भक्त को अंतर्मन पर ध्यान केंद्रित कर आध्यात्मिक जागरूकता की और अग्रसित करती हैं ।
इस दिन उपवास, रुद्राभिषेक और रात्रि जागरण करने से सौ यज्ञों के बराबर पुण्य मिलता है, सभी पाप धुल से जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। शिवरात्रि से कई किंवदंतियां जुड़ी है जो शिव के निराकार और अन्नत रूप का प्रतिनिधित्व करती है इसमें शिकारी की कथा के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन अनजाने में की गई पूजा (शिवलिंग पर बेलपत्र गिरने और रात भर जागने) से भी एक शिकारी को मोक्ष मिल गया था,जो महादेव की कृपालुता को दर्शाता है। शिव शंकर ही जगत में ऐसे देव हुए जिन्हें मोह माया से विरक्त माना गया जो श्मशान की भस्म से प्रसन्न हो अर्थात संसार में मनुष्य को सीखना चाहिए कि परोपकार ही असली सेवा है जैसे नीलकंठ के रूप में शिव ने जगत कल्याण किया। यह रात्रि इसलिए भी विशेष है कि क्योंकि आधुनिक युग में जीवन की गति बहुत तेज है और मनुष्य आंतरिक उद्देश्य से विमुख हो जाता हैं और आत्म विश्वास के लिए आत्म संपर्क, आत्मचिंतन परमावश्यक है यही आत्मचिंतन का सरल मार्ग है जो अपने भीतर के द्वंद्व को रोकता है और आत्मबोध होने से जीवन में नई ऊर्जा का संचार होता है।