◆जन्मदिन 2 जनवरी पर विशेष◆
◆माथुर का व्यक्तित्व अनुशासन, राष्ट्रभक्ति और संगठन शक्ति की त्रिवेणी◆
(दिव्यराष्ट्र के लिए डॉ. विजय विप्लवी,)
कुशल संगठक और राष्ट्रनिष्ठ साधक ओमप्रकाश माथुर का जीवन भारतीय सार्वजनिक जीवन में समर्पण, अनुशासन और संगठन शक्ति की एक सशक्त मिसाल है। मां भारती की उपासना को साधना मानने वाले ओमप्रकाश माथुर का व्यक्तित्व किसी एक पद, भूमिका या कालखंड में सीमित नहीं, बल्कि निरंतर चलने वाली सेवा-यात्रा का प्रतीक है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अनुशासित स्वयंसेवक के रूप में गढ़ा गया उनका व्यक्तित्व, समय के साथ संगठनकर्ता, मार्गदर्शक, रणनीतिकार और संवैधानिक दायित्वों के निर्वाहक के रूप में विकसित हुआ।
उनका जीवनवृत्त जमीनी कार्यकर्ता से आरंभ होकर किसान संघ के प्रदेश संगठन मंत्री, राजनीतिक कार्यकर्ताओं के शिल्पी, भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश संगठन महामंत्री, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, महासचिव, सांसद् जैसे उत्तरदायित्वों, अनेक राज्यों में संगठन सुदृढ़ीकरण और चुनावी प्रबंधन से होता हुआ राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचा है। दायित्व चाहे जो रहा हो पर सादगी, संवाद और कार्यकर्ता-भाव उनकी पहचान बनी रही। वे ऐसे नेता रहे, जिन्होंने मंच से अधिक संगठन की पंक्तियों में विश्वास किया और व्यक्तिगत यश से अधिक सामूहिक लक्ष्य को प्राथमिकता दी।
संवैधानिक पद पर आसीन होकर भी उनका आचरण संघ-संस्कारों से अनुप्राणित रहा। राजभवन की गरिमा को उन्होंने केवल प्रशासनिक केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना का मंच बनाया। माथुर का जीवनवृत्त अनुशासन, राष्ट्रभक्ति और संगठन शक्ति की त्रिवेणी है।
2 जनवरी 1952 को बेडल (फालना) के जमीदार परिवार में जन्मे माथुर का सार्वजनिक जीवनवृत्त संघ के संचलन में अश्वारूढ़ ध्वजवाहक स्वयंसेवक से आरंभ होकर किसान संघ के प्रदेश संगठन मंत्री, भारतीय जनता पार्टी के संगठन महामंत्री, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, राष्ट्रीय महासचिव जैसे उत्तरदायित्वों, अनेक राज्यों में संगठन सुदृढ़ीकरण और चुनावी प्रबंधन से होता हुआ राज्यसभा व राजभवन तक पहुंचा है। वर्षों तक सत्ता के केन्द्र व वर्तमान में सत्ता में रहते हुए भी सादगी, संवाद और कार्यकर्ता-भाव उनकी पहचान बनी रही। वे ऐसे नेता रहे, जिन्होंने मंच से अधिक संगठन की पंक्तियों में विश्वास किया और व्यक्तिगत यश से अधिक सामूहिक लक्ष्य को प्राथमिकता दी। संवैधानिक पद पर आसीन होकर भी उनका आचरण संघ-संस्कारों से अनुप्राणित रहा। राजभवन की गरिमा को उन्होंने केवल प्रशासनिक केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय एकता का मंच बनाया। निर्णयों में दृढ़ता, व्यवहार में शालीनता और दृष्टि में दूरदर्शिता उनके सार्वजनिक जीवन के स्थायी गुण रहे हैं। संगठन ने उन्हें जब जो आदेश दिया, उसको मनोयोग से पूरा किया। अपनी विशिष्ट कार्यशैली व देशभर में व्यापक परिचय के कारण वे किसी पद से नहीं वरन् ओमजी भाई साहब के नाम से ही जाने जाते है। अपने जीवन का सर्वस्व मां भारती को समर्पित करने का निर्णय करने के बाद संगठन ने जब जो आदेश दिया, उसको मनोयोग से पूरा किया। चरैवेति- चरैवेति को जीवन का मूलमंत्र मानकर किसान संघ के संगठन मंत्री के रुप में मोटरसाइकिल पूरे राजस्थान का प्रवास किया।
■ संघ से सम्पर्क :-
माथुर के संघ की गणवेश पहनकर पहली बार प्रार्थना करने का संस्मरण भी अविस्मरणीय है। सन् 1971 में फालना में संघ का पथ संचलन व तहसील सम्मेलन होना था, उसमें प्रांत प्रचारक ब्रह्मदेव जी का बौद्धिक होना था। संचलन में संघ का ध्वज अश्वारोही स्वयंसेवक को सौपने की रचना बनी। संचलन से पूर्व घोष की आवाज में घोड़ा बिदक गया। घोड़े पर बैठने के लिये स्वयंसेवक गणपत सोनी नाम तय था। घोड़ा बिदका तो उनसे नियंत्रित नहीं हुआ। अब खोज शुरु हुई अश्व को नियंत्रित करके ध्वज लेकर कौन बैठे? संघ के तत्कालीन पाली जिला प्रचारक विद्याधर पालीवाल को जानकारी थी, युवक ओमप्रकाश माथुर को घुडसवारी का शौक है, उनके घर घोडे भी पाले हुए है। जिला प्रचारक ने माथुर से सम्पर्क साधा और समस्या बताई। माथुर ने कहा इस घोडे की सवारी तो मैं कर लूगां, लेकिन मेरे पास संघ की गणवेश नहीं है। उसी समय माथुर घोडे पर सवार होकर ऐड़ लगाई उस नदी तक घूमा लाये। तब तक गणवेश की व्यवस्था हो गयी, वे गणवेश पहनकर संघ का परम् पवित्र भगवाध्वज हाथ में लेकर अश्वारूढ़ हुए। माथुर ने उस दिन हुई पहली प्रार्थना के बाद माथुर का संघ के प्रति अनुराग बढता ही गया और उन्होनें 1972 में संघ प्रचारक के रुप में अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित करने का संकल्प ले लिया। अपने स्वयंसेवक जीवन के पहले प्रचारक विद्याधर जी से उनका स्नेह सम्पर्क आजीवन रहा।
■ किसान संघ के संगठन मंत्री :-
1972 से 79 तक विभिन्न जिलों में जिला प्रचारक रहे माथुर आपातकाल में 11 माह तक लोकतंत्र सैनानी के रुप में कारावास में रहे। उसके पश्चात 10 वर्ष तक भारतीय किसान संघ के राजस्थान प्रदेश संगठन मंत्री रहे। चरैवेति- चरैवेति को जीवन का मूलमंत्र मानकर किसान संघ के संगठन मंत्री के रुप में मोटरसाइकिल से पूरे राजस्थान का प्रवास किया। इन दस वर्षों में जयपुर में चौमूं हाउस के निकट कर्नल लक्ष्मणसिंह शेखावत के घर के गैराज में बना किसान संघ का कार्यालय ही उनका आवास रहा।
■ जीरा आंदोलन से बनी जननेता की छवि :-
80 के दशक में किसान संघ के संगठन मंत्री माथुर की अगुवाई में विशाल जीरा आंदोलन हुआ। किसानों के मध्य कार्य करते हुए उनके ध्यान में आया कि जीरे की पैदावार राजस्थान के जालौर व सिरोही में होती है और उसकी मंडी गुजरात के ऊंझा में है। किसानों को गुजरात जीरां लेजाकर बेचने पर पाबन्दी थी। कुछ व्यापारी व बिचोलियों को इसका लाभ होता था। माथुर ने किसानों में जनजागरण करके इस नियम विसंगति के विरुद्ध संघर्ष का आव्हान किया। उनके आव्हान पर लगभग 250 ट्रेक्टर जीरा लेकर किसान राजस्थान गुजरात की सीमा मण्डारडी चौकी पर आंदोलन शुरु किया। उस समय इंडियन एक्सप्रेस सहित राष्ट्रीय मीडिया ने भी आंदोलन को स्थान दिया। आखिरकार सरकार चेती, तत्कालीन बिक्री कर आयुक्त पी.एन.भंडारी व क्षैत्रीय एसडीएम दीपक उप्रेती मौके पर आये। आंदोलनस्थल पर ही वार्ता के बाद नियम बदलने के आदेश हुए। किसानों को अपने खेत में बुवाई की गिरदावरी रिपोर्ट के आधार पर जीरा गुजरात ले जाने की अनुमति मिली। मेरी जानकारी में यह प्रदेश का पहला किसान आंदोलन था, जिसमें मौके पर ही नियम बदलने के आदेश जारी हुए। इस आंदोलन की सफलता से माथुर की लोकप्रिय व संघर्षशील जननेता की छवि मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत के ध्यान में आई। इसके बाद संघ व शेखावत की सहमति से वे 1989 में वे भाजपा के राजस्थान प्रदेश के महामंत्री संगठन बनाये गये।
■ 1993 में शेखावत का चुनाव :-
मुख्यमंत्री शेखावत ने 1990 का चुनाव बाली (पाली) से जीता था। 1993 के चुनाव में शेखावत ने पार्टी बैठक में बताया वे यह चुनाव बाली से नहीं लड़कर नये क्षैत्र श्रीगंगानगर से चुनाव लडेंगे। माथुर ने कहा वो सीट आपके लिये सुरक्षित नहीं। शेखावत नहीं माने और श्रीगंगानगर से नामांकन भर दिया। संगठन मंत्री माथुर ने अपने प्रभाव का उपयोग करते हुए उनके पास मौजूद शेखावत का एक अतिरिक्त नामांकन भाजपा नेता पुष्प जैन व प्रस्तावक को भेजकर बाली से भी दाखिल करवा दिया। शेखावत ने इस पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। माथुर ने कहा आप मुख्यमंत्री है, मेरा निवेदन है श्रीगंगानगर सीट के बारे में फीडबैक ठीक नहीं है, आप दोनों सीट से जीत जायें तो एक सीट से त्यागपत्र देना। शेखावत बाली के नामांकन से असंतुष्ट ही रहे , बाद में बहुत बार कहने पर डेढ़ दिन के लिये बाली में प्रचार पर आये। बीजापुर के पास दानावर्डी व कुछ गावों में सभाएं की। शाम को बाली में शेखावत की सभा हुई, अनमने मन से प्रचार में आये शेखावत ने सभा में यहां तक कह दिया, यदि वे दोनों सीटों से चुनाव जीतते है, तो वे बाली की सीट से त्यागपत्र देगे। शेखावत की घोषणा से माथुर व कार्यकर्ता दुखी हुए, लेकिन माथुर अपनी टोली के साथ प्रचार की कमान थामें रहे। मतगणना के बाद जब परिणाम आया, तो शेखावत केवल बाली से ही जीत पाये। इस चुनाव ने माथुर का कद संगठन में और बढ़ा दिया। इस चुनाव में पांच प्रदेशों में से केवल राजस्थान में ही भाजपा की दुबारा सरकार बनी थी।
■ भाजपा के संकटमोचक :-
भाजपा में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, कुशाभाऊ ठाकरे, सुंदरसिंह भंडारी, भैरोंसिंह शेखावत, नरेन्द्र मोदी, राजनाथ सिंह, रामदास अग्रवाल के साथ लम्बे समय तक कार्य किया। संघ में वाष्ठ प्रचारक ब्रह्मदेवजी, सोहनसिंह जी व लक्ष्मणसिंह जी शेखावत का मार्गदर्शन माथुर को सदैव रहा।
भैरोंसिंह शेखावत सरकार का तख्तापलट करने के प्रयासों के मध्य राजस्थान में जनता दल का विभाजन करवाकर जनता दल (दिग्विजय) गठित करवाकर सरकार बचाने में सफल रहे। मुख्यमंत्री शेखावत जब विदेश में उपचार के लिये गये, तब उनकी सरकार के विरुद्ध हुए तख्तापलट का षडयंत्र विफल करने में वे प्रमुख रणनीतिकार थे। महाराष्ट्र के प्रभारी रहते जब शिवसेना ने अधिक सीटों की मांग की तो माथुर ने ही भाजपा को महाराष्ट्र की सभी सीटों पर अकेले चुनाव लडने का निर्णय करवाया और बहुमत के साथ सरकार गठित करवाई। अनेक प्रदेशों में सरकार व संगठन से जुड़े पेचिदा मुद्दों को उन्होंने बखूबी सुलझाया। नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्री कार्यकाल में वे अधिकांश समय गुजरात के प्रभारी रहे।
लगभग चालीस वर्षों से माथुर के संघ प्रचारक, किसान नेता, भाजपा नेता, राज्यसभा सांसद् से राज्यपाल तक की यात्रा का मैं साक्षी हूं। मैंने शेखावत व माथुर के अलावा ऐसे राजनेता गिनेचुने ही देखै है, जिनका राजस्थान में तहसील व पंचायत स्तर के कार्यकर्ता से जिनका सीधा सम्बन्ध हो। इसी कारण उन्हें कार्यकर्ताओं का हृदय सम्राट माना जाता है। कार्यकर्ता व मित्रों के सुख दुख में सहभागिता व देखभाल इनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषता है। माथुर के व्यक्तित्व में वाजपेयी जैसी उदारता व सौम्यता, आडवाणी जैसी संगठनात्मक दृढता व संस्थागत प्रतिबद्धता, शेखावत जैसी राजनीतिक सुझबूझ व सम्पर्क व नरेन्द्र मोदी जैसी निर्णायक कार्यशैली का समन्वय है, वे दीर्धकाल तक समाज व राष्ट्र को अपने अनुभव से लाभान्वित करते रहे, यही कामना..