
बाल विवाह के खिलाफ भारत आज संकल्प से सिद्धि की ओर बढ़ रहा है। केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, न्यायपालिका और नागरिक समाज सभी मिलकर इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिए एकजुट हैं। ऐसे समय में यह विमर्श बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि किन बिंदुओं पर विशेष ध्यान दिया जाए ताकि वर्ष 2030 से पहले ही बाल विवाह का पूरी तरह खात्मा किया जा सके। हालांकि देशभर में इसके कारणों में कुछ समानताएं हैं, लेकिन हर राज्य की परिस्थितियां अलग हैं। राजस्थान का उदाहरण इस संदर्भ में विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जहां परंपराएं और सामाजिक दबाव अक्सर बाल विवाह को बढ़ावा देते रहे हैं। अक्षय तृतीया की तरह ही हर धर्म और समुदाय में कुछ विशेष धार्मिक व सांस्कृतिक मुहूर्त होते हैं, जिन्हें अत्यंत शुभ माना जाता है; इन अवसरों पर बड़ी संख्या में विवाह आयोजित किए जाते हैं। लेकिन यही दिन वर्षों से हजारों बच्चों, खासकर बच्चियों के लिए पीड़ा और अन्याय का कारण बनता रहा है।
हालांकि अब परिस्थितियां धीरे-धीरे बदल रही हैं और बढ़ती जागरूकता के साथ बाल विवाह पर रोक लगाने के प्रयासों ने गति पकड़ी है, लेकिन इस कुप्रथा को जड़ से समाप्त करने के लिए समाज की सामूहिक भागीदारी और सक्रिय सहयोग अत्यंत आवश्यक है। जब समुदाय, प्रशासन और परिवार मिलकर काम करते हैं, तभी ऐसे मामलों को समय रहते रोका जा सकता है। हाल ही में राजस्थान के ब्यावर जिले के एक छोटे से गांव में रहने वाली सीमा (बदला हुआ नाम) की कहानी इस कठोर सामाजिक सच्चाई को बेहद करीब से उजागर करती है। उसका विवाह महज तीन-चार साल की उम्र में कर दिया गया था। समय बीतता गया, लेकिन बचपन में मां बाप द्वारा लिया गया फैसला उसके भविष्य पर काली छाया बनकर मंडराता रहा। जब वह 14 साल की हुई, तो उस पर ससुराल जाने का दबाव बढ़ने लगा। परिवार और समाज की परंपराएं उसके जीवन को अंधकार में धकेलने को तैयार थीं तभी उसके स्कूल में बाल विवाह के खिलाफ बाल अधिकारों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए जमीन पर काम करने वाले नागरिक समाज संगठनों का देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) की सहयोगी संस्था दिशा – आरसीडीएसएसएस ब्यावर, अजमेर का जागरूकता शिविर उसके लिए ढाल बनकर आया। यह दिखाता है कि कानून के साथ-साथ जागरूकता अभियान की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है। इसी क्रम में जेआरसी 250 से अधिक सहयोगी संगठनों के साथ समाज को जागरूक करने के लिए देशभर में ‘बाल विवाह मुक्ति रथ’ जैसी प्रभावशाली और जमीनी पहल शुरू की है।
अकेले राजस्थान में यह पहल 38 जिलों तक पहुंचकर सीधे समुदायों से संवाद कर स्पष्ट संदेश दे रही है कि बाल विवाह एक अपराध है और इसे समाप्त करना हम सभी की जिम्मेदारी है। ये रथ स्थानीय लोगों से संवाद करते हैं, किशोर-किशोरियों को उनके अधिकारों की जानकारी देते हैं, अभिभावकों को कानून समझाते हैं और समुदाय को यह एहसास कराते हैं कि कम उम्र में शादी बच्चों के भविष्य पर ग्रहण है। बाल विवाह मुक्ति रथ की ये पहल केवल राजस्थान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के 25 राज्यों के 439 जिलों में चलाई जा रही है। यह अभियान कानून प्रवर्तन एजेंसियों, प्रशासन, पंचायतों, स्कूलों और स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर बच्चों की सुरक्षा के लिए कानूनी जागरूकता बढ़ा रहा है। इससे बाल विवाह के खिलाफ मजबूत माहौल बन रहा है।
इस इकोसिस्टम में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए सरकार और नागरिक समाज संगठन मिलकर निरंतर और समन्वित प्रयास कर रहे हैं। फिर भी आंकड़े बताते हैं कि परंपरा की जड़ें अब भी गहरी हैं। बीते एक वर्ष में नागरिक समाज संगठनों ने सरकार के सहयोग से 22,480 बाल विवाह रुकवाए हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-5 के अनुसार, राजस्थान के 41 जिलों में से 20 में बाल विवाह की दर राष्ट्रीय औसत 23.3 प्रतिशत से अधिक है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन के साथ-साथ समाज की सोच में बदलाव भी उतना ही आवश्यक है।
पिछले कुछ वर्षों में राजस्थान में नागरिक समाज के साथ-साथ सरकार की प्रतिबद्धता और न्यायालय के निर्णयों से बाल विवाह रोकने की दिशा में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है। इसी क्रम में एक मई 2024 को राजस्थान उच्च न्यायालय में तत्काल सुनवाई की मांग करते हुए जेआरसी ने एक याचिका दायर की, जिसमें बच्चों को बाल विवाह से बचाने के लिए त्वरित हस्तक्षेप की जरूरत पर जोर दिया गया। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए 2 मई को उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने गांवों के पंचों और सरपंचों सहित ग्राम परिषद के सदस्यों को बाल विवाह रोकने के लिए जवाबदेह ठहराया। यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे संदेश गया कि बाल विवाह सिर्फ पारिवारिक मामला नहीं, बल्कि कानूनन अपराध है और इसे रोकना पूरे समाज की जिम्मेदारी है। इस फैसले ने प्रशासन, पंचायतों और सामाजिक संगठनों के बीच एक मजबूत सहयोग तंत्र बनाने की दिशा में नई मिसाल कायम की। इससे स्पष्ट है कि कानूनी हस्तक्षेपों के अलावा जागरूकता बेहद जरूरी है क्योंकि जब तक समाज स्वयं यह नहीं समझेगा कि बाल विवाह बच्चों के अधिकारों का हनन है, तब तक पूरी तरह से इसका खात्मा मुश्किल रहेगा।